इबादत आराम से उबासी लेते हुए अपने मुँह के पास से हाथ हटाकर, सीधे जुबेर साहब के पास गई। उनके कंधे पर सिर रखकर बड़े प्यार से बोली
“बड़े अब्बा… मुझे ना आप कॉलेज में एडमिशन करवा दो यार। बताइए, आपको मेरा रिज़ल्ट आ गया। वो भी बहुत अच्छा!”
वह नींद में ही वैसे बोल रही थी। जुबेर साहब के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। उन्होंने उसके सर पर हाथ रखकर प्यार से सहलाया और कहा
“हाँ बेटा, बस तुम पहले जाकर फ्रेश हो जाओ। फिर हम दोनों मिलकर सीधे कॉलेज चलते हैं, तुम्हारा एडमिशन करवाने के लिए।”
इबादत ने जैसे ही यह सुना, उसकी नींद एकदम से गायब हो गई। वह तुरंत आगे बढ़ी और बोली
“सच में बड़े अब्बा? आप चलेंगे? आपको पता है, मम्मी ने कहा था कि अगर आप इजाज़त देंगे तभी मैं आगे पढ़ पाऊँगी। पर आप तो इसे ही मान गए आप बहुत अच्छे हैं!”
यह कहते हुए वह उनके सीने से लग गई।फिर वह धीरे से खुद से कहती हैं
“काश यह बात मैंने आपसे कल कही होती… तो आज मुझे इस जलनखोर, ख़ुदगर्ज़ इंसान से निकाह ही नहीं करना पड़ता। यह अम्मी भी न… हमेशा रोक लेती हैं।”
यह कहते हुए वह तीखी नज़रों से सामने बैठी हुई मेहमाल बेगम को देख रही थी ।
मेहमाल बेगम ने और भी बुरे अंदाज़ में पलटकर चिल्लाते हुए कहा
“तुम बेवक़ूफ़ लड़की! तुम्हारे अंदर अक़्ल का एक भी दाना है या नहीं? कल ही तुम्हारा निकाह हुआ है और यह किस हुलिए में कमरे से बाहर निकल आई हो? कोई तुम्हें देखेगा तो क्या सोचेगा… कि तुम नई नवेली दुल्हन हो?”
इबादत भाड़कते हुए बोली
“तो आप क्या चाहती हैं? नई नवेली दुल्हन हूँ तो क्या मतलब है? ऊपर से लेकर नीचे तक ज़ेवर पहनूँ, नए-नए जोड़े पहनूँ, मेकअप करके बैठूँ? यह सब मुझसे नहीं होगा। और अगर आप चाहती हैं कि यह सब मैं करूँ, तो आप जियान भाई साहब से भी जाकर कहिए कि वह भी सज-धज कर आएँ… मेरे लिए!”
इतना कहना ही था कि मेहमाल बेगम का ग़ुस्सा और भड़क गया। वह उठते हुए बोलीं
“या खुदा! यह लड़की… यह लड़की कभी नहीं सुधर सकती। यह तो अपना रिश्ता बर्बाद करके ही रहेगी।”
इबादत ने भी पलटकर कहा
“हाँ! तो मैंने कब कहा था कि मेरे से 8 साल बड़े उस लड़के से, जिसे मैं बचपन से भाई-भाई कहती आई,हु उस से मेरा निकाह कर दो? आप ही लोगों ने किया न? तो अब यह सब होगा ही… नॉर्मल है!”पहले जब मैं छोटी थी और भाई नहीं कहती थी, तो वह शिकायत करते थे… क्या भाई नहीं केहती ? और आप मेरा कान मोड़ते थे।
भला हो कि मुझे इतनी अच्छी बड़ी अम्मी मिली हैं, जो अक्सर मुझे अपने उस शैतान बेटे से बचा लेती थीं।
और आप! अब तो मेरा निकाह हो गया… अब भी आप मुझे डाँट रही हैं?”
यह कहकर वह अपने बगल में बैठे हुए जुबेर साहब के सीने से लग गई।
“देखिए न बड़े अब्बा, यह कैसे डाँट रही हैं मुझे। बोलिए, अब इनको कुछ अब तो मैं आपकी बहू हूँ न? आप इन्हें कहिए, यह मुझे इस तरीक़े से डाँट नहीं सकतीं। अगर यह मुझे डाटेंगी, तो मैं इनसे बिल्कुल भी बात नहीं करूँगी!”
जुबेर साहब को हमेशा से एक बेटी चाहिए थी। वह तो बहुत चाहते थे कि जीहान के बाद उनकी छोटी बेटी भी हो जाए। पर शायद किस्मत को यह मंज़ूर नहीं था।
हुआ भी कुछ ऐसा कि पूरे 8 साल बाद घर में दोबारा खुशख़बरी आई, जब मेहमाल बेगम प्रेग्नेंट हुईं। सब बहुत खुश थे।
उस वक़्त जुबेर साहब की सबसे बड़ी ख़्वाहिश यही थी कि काश घर में बेटी हो। वह उसके लिए दुआएँ करते थे। और हुआ भी ऐसा ही…
जब से इबादत इस घर में आई थी, उनका सारा प्यार सिर्फ़ उसी के लिए था।
वह बचपन से ही बहुत क्यूट थी। एकदम गोल-मटोल, जैसे सफ़ेद कश्मीरी सेब। उसके गाल गुलाबी थे, और आँखें गहरी सियाह काली।
लंबी पलकें, मासूम चेहरा… बचपन में इतनी प्यारी थी कि जो भी उसे देखता, उसी पर दिल हार बैठता था।
और आज भी वक़्त बदला नहीं था। आज भी वही हाल था। अक्सर लोग ससुराल जाने के बाद बदल जाते हैं, रिश्ते बदल जाते हैं।
पर यहाँ पर ऐसा कुछ भी नहीं था। बल्कि जुबेर साहब उसे पहले से भी ज़्यादा चाहने लगे थे।
वह तो हमेशा से ही चाहते थे कि इबादत उनके घर की बहू बने। क्योंकि जब वह बड़ी हुई थी, तो उसके रिश्ते उम्र से पहले ही आने लग गए थे। यह बात उन्हें अक्सर नागवार गुजरती थी।
वह हर लड़के में खामियाँ निकालकर उसे रिजेक्ट कर देते थे। फिर आख़िर में हार मानते हुए उन्होंने खुद ही जाकर सबसे कहा था कि
“इबादत के बड़े होने पर, म उसका निकाह अपने बेटे से करवाना चाहता हूँ… ताकि मेरी बेटी मुझसे दूर न जाए। यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।”
और फिर, ज़ाकिर साहब के जल्दी इस दुनिया से चले जाने के बाद, सारी ज़िम्मेदारी जुबेर साहब ने ही उठाई थी।
उसी वक़्त, जीनत बेगम वहाँ आईं और बोलीं
“अरे, क्यों डाँट रही हो मेरे बच्चे को? तुम्हें तो बस उसे डाँटने का बहाना चाहिए। कोई बात नहीं न, गलती हो गई होगी उससे। उसने ध्यान नहीं दिया।”
यह कहते हुए वह इबादत के पास आईं और उसके सर पर हाथ रखकर प्यार से बोलीं
“बच्चे ऐसे बाहर नहीं आते। जाओ, जाकर पहले फ्रेश हो जाओ।”
इबादत ने एक नज़र उन्हें देखा और गले लगाते हुए बोली
“अगर आप नहीं होतीं, तो मेरा क्या होता इस जालिम दुनिया में? मेरी अम्मी ही कसाई बनी हुई हैं। चलो… आप इतने प्यार से कह रही हैं, तो आपकी बात मान लेते हैं।”
यह कहते हुए वह कमरे की तरफ़ बढ़ गई।
जीहां जो ये सब देख रहा था , वह खुद से कहता
"इस लड़की को तो बस चले तो मुझे कच्चा चबा जाए। पर इसका सिक्का तो मैं ही फ्री करूंगा।"
इतना कहते हुए, वह सबके बीच आ गया।
एक नज़र सबकी तरफ डाली, और फिर अपनी नज़रों को वापस जीनत बेगम की ओर करते हुए बोला
"अम्मी मेरी आज की फ्लाइट है और मैं जा रहा हूं। बस मुझे वहां जाकर अपने काम पर फोकस करने दीजिएगा। तो फिजूल के कोई कॉल या मैसेज मत करना। और हां, यह बात आप अपनी उस लाडली को भी बता देना कि इस बार कहीं जाकर उसकी कोई भी विश पूरी नहीं करूंगा।
"ना ही उसकी वह लंबी-चौड़ी, अपने साइज जैसी लिस्ट भेजा करे। क्योंकि अब वह जानती है कि मैं उसका कोई काम नहीं करूंगा। इसी वजह से वह आपके पीछे आती है अपना काम करवाने के लिए। लेकिन इस बार… नहीं करूंगा। सुना आपने?"
उसने इतना कहा ही था कि जुबेर साहब ने उसे अजीब नज़रों से देखते हुए जवाब दिया
"जब अपनी मनमर्ज़ी ही कर रहे हो, तो यहां बात करने क्यों आए हो? सीधा बोलो, हुक्म चला कर जा रहे हो, ना कि इजाज़त लेकर। और हां, वहां पहुंचने के बाद एक बार कॉल ज़रूर कर लेना कि तुम अच्छे से पहुंच गए हो। क्योंकि अब ज़िम्मेदारी है तुम्हारे कंधों पर… हमारी बेटी की। वरना तुम क्या करते हो, हमें कोई मतलब नहीं।"उनका jihaan का निकाह के दूसरे दिन ही जाने का प्लान बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था।
वह हरगिज़ नहीं चाहते थे कि जिहां अपना प्रोफेशन जारी रखे।
वह चाहते थे कि jihaan भी बिज़नेसमैन बने।
इसी वजह से दोनों के बीच अक्सर लड़ाइयाँ हुआ करती थीं।
और इस सबके बीच सिर्फ जीनत बेगम पिसकर रह जाती थीं… कभी बेटे के चक्कर में, तो कभी अपने शहर के चक्कर में।
Jihaan ने एक नज़र सबकी तरफ डाली।
फिर साइड में रखा हुआ सूटकेस उठाते हुए बोला
"ख़ुदा हाफ़िज़। मिलते हैं… अब सीधा दो साल बाद। फाइनली, मुझे आज़ादी मिलेगी।"
इतना कहते हुए उसने एक नज़र अपने कमरे की तरफ डाली, जहाँ इबादत अभी तक तैयार होकर नहीं आई थी थे।
उसके दिमाग में न जाने क्या आया… और वह कुछ सोचकर सीधा अपने कदम ऊपर की ओर बढ़ा देता है।
उसे यूँ जाता हुआ देख, पहले तो किसी को अच्छा नहीं लगा कि वह बिना इबादत से मिले ही जा रहा है।
लेकिन जैसे ही वह ऊपर की तरफ बढ़ा, सबके होठों पर मुस्कान आ गई।
Jihaan अपने कमरे में पहुँचा।
उसकी नज़र सीधी इबादत पर पड़ी, जो ड्रायर से अपने बाल सुखा रही थीं।
उन्होंने उस वक़्त आसमानी रंग का भारी-भरकम जोड़ा पहन रखा था।
कानों में छोटी-छोटी बालियाँ थीं, और गहरा काजल उनकी आँखों को खूबसूरत बना रहा था।
उसे यूँ देख, जिहान का दिल एक पल के लिए ठहर सा गया।
इबादत को इस तरह तैयार देख, वह कुछ पल तक बस निहारता ही रह गया। उसकी सास जैसे उसे बगावत पर उतर आए थी ।



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