06

2साल बाद बदली इबादत

जीहां के जाने के बाद दिन इसी तरह निकल रहे थे यह एक वक़्त ऐसा आया कि समय इतनी जल्दी बीता कि उसका एक सेमेस्टर पूरा हो चुका था।

वह बहुत ही ज़्यादा एक्साइटेड थी।

इस दौरान न तो उसने एक बार भी जिहान को कॉल किया, न कोई मैसेज भेजा।

और न ही जिहान ने उसे कॉल करने की हिमाकत की।

उसका खयाल था कि इबादत कॉल करेगी… पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

दोनों के बीच का राब्ता जैसे पूरी तरह ख़त्म हो चुका था।

इसी तरह दो साल निकल गए।

दो साल बहुत कुछ बदल चुका था।

एक पूरी हँसती-खेलती ज़िंदगी पलट गई थी।

इबादत पूरी तरह से बदल चुकी थी।

नील हवेली में सभी नौकर जल्दी-जल्दी काम कर रहे थे।

जीनत बेगम और उनके साथ मेहमाल बेगम हवेली के कामों में मशगूल थीं।

जीनत बेगम एक मुलाज़िम पर चिल्लाईं

"यह वहाँ क्या रख रहे हो? मैंने कहा था ना, यह चीज़ ऐसे नहीं, वैसे रखो! और जाकर देखो, खाना तैयार हुआ है या नहीं!"

आज फाइनली जिहान वापस आ रहा था।

जीनत बेगम ने सिर्फ़ इतना बताया था कि वह लौट रहा है।

उसकी जॉब के बारे में उन्होंने कुछ नहीं बताया।

और न ही यह बताया कि वह आज आएगा या कल।

पर घर के लोग पहले ही बहुत खुश थे।

इसीलिए उन्होंने अपने काम अभी से शुरू कर दिए थे।वही इबादत,

जो अभी-अभी घर में दाख़िल हुई थी।

आसपास सभी को इस तरह काम करता देख,

वह धीमे-धीमे आगे बढ़ रही थी।

उसकी नज़रें नीचे झुकी हुई थीं।

उसने सर से लेकर पाँव तक अपने ऊपर एक बड़ी-सी ईरानी चादर लपेट रखी थी।

जिसमें उसका वजूद बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था,

सिवाय उसकी गहरी काली आँखों के।

वो भी बा-अदब नीचे की ओर झुकी हुई थीं।

ना उसका चेहरा नज़र आ रहा था,

ना ही यह मालूम हो रहा था कि उसने क्या पहना है।

बिना किसी से कुछ कहे,

वह आहिस्ता-आहिस्ता मेहमlलबेगम के पास पहुँची।

उनका हाथ पकड़ते हुए बोली

"अम्मी... अम्मी, कमरे में चलिए ना। मुझे... मुझे फ्रेश होना है।"

उसने एक नज़र उठाकर उन्हें देखा भी नहीं था।

मेहमाल बेगम हैरानी और परेशानी से बोलीं

"तुम क्या कह रही हो इबादत? बीस साल की हो गई हो तुम!

मैं पिछले एक साल से तुम्हें देख रही हूँ।

यह क्या हालत बना ली है अपनी?

कब से तुम पर्दा करने लगी हो?

पर्दा करना अच्छी बात होती है,

लेकिन घर के अंदर भी नज़रें नीचे झुकाना...

ख़ुदा के लिए, खुद को बदलो।

मैं तुम्हारे लिए परेशान हो गई हूँ।

जब तुम्हें खाना खाना होता है,

तो तुम ठीक से खाती भी नहीं हो।

तुम्हारी ये हालत मुझे रुला देती है।"*अपने कमरे में तक नहीं सोते,

पूरा वक्त मेरे साथ रहती हो।

तुम्हें नहाना भी होता है,

फिर भी मेरे पीछे पड़ जाती हो।

इबादत नज़रें नीचे झुकाए हुए,

काँपती सी आवाज़ में बोली

"मम्मी... आप ऐसा क्यों कह रही हैं?

मुझे डर लगता है ना अकेले...

आप प्लीज़... आप प्लीज़ चलिए ना।

मुझे अच्छा नहीं लग रहा।"

मेहमाल बेगम के इतना चिल्लाने पर,

जीनत बेगम सामने आईं।

उन्होंने इबादत को सख़्त नज़रों से देखते हुए कहा

*"बेटा, क्या हुआ है?

हम सब तुमसे पूछ रहे हैं,

पर तुम किसी से बात नहीं करती।

पहले जैसी नहीं रही।

आख़िर किस चीज़ का इतना डर लगा हुआ है?

मुझे यह समझ नहीं आता।

खुदा का वास्ता, हमें बताओ तो सही।

हम तुम्हारी परेशानी का हल निकालेंगे।

चलो, मैं तुम्हें कमरे में लेकर चलती हूँ।

पहले तुम अच्छे से फ्रेश हो जाओ।"*

यह कहते हुए उन्होंने इबादत का हाथ पकड़ा,

और कमरे की ओर बढ़ गईं।

वहीं इबादत धीरे-धीरे चल रही थी।

उसकी नज़रें इधर-उधर घूम रही थीं।

उसकी आँखों में डर साफ़ दिखाई दे रहा था।

वह जल्दी से कमरे में दाख़िल हुई।

जिन्नत बेगम ने उसे बेड पर बैठाया।

उन्होंने नरमी से कहा

"अब बताओ इबादत,

आख़िर माजरा क्या है?"

इबादत घबराकर उन्हें देखते हुए बोली

"क्या... क्या चीज़?

आप... आप क्या पूछ रही हैं?""मैं बस यही पूछ रही हूँ कि तुम्हें हुआ क्या है?

जब से हम लोग तुम्हारी नानी के घर से वापस आए हैं,

तब से तुम कितनी अजीब सी लगने लगी हो।

तुम ऐसी तो नहीं थी...

इतनी खामोश, इतनी चुप-चुप...

इतनी ढीली-ढाली, इतनी सहमी-सहमी।

क्या हुआ है? बताओ।

हम लोग एक साल से पूछ-पूछकर परेशान हो गए हैं।

इस तरीक़े से तो मैं खुद डिप्रेशन में चली जाऊँगी।

यह दवाइयाँ... तुम...

पता भी है जिहां अगर तुम्हें इस हालत में देखेगा,

तो वह क्या कहेगा?

यही ना, कि हमने तुम्हारा ख्याल भी नहीं रखा!"*

यह कहते-कहते

जीनत बेगम की आवाज़ भर्रा गई।

इबादत के होठों पर

ऐसी मुस्कुराहट खेली थी,

जैसे मुस्कुराना भी उसे तकलीफ़ दे रही हो।

वो धीरे से बुदबुदाई काश... ऐसा होता कि मेरा निकाह किसी और से हुआ होता।"

यह कहकर उसने

अपनी नज़रें फिर झुका लीं।

"नहीं बड़ी मम्मी...

ऐसा कुछ भी नहीं है।

अब बस यही रहेगा।

मैं... अभी...

अभी नहा कर आ जाऊँगी।"

काँपते हुए उसने

अलमारी की ओर कदम बढ़ाए।

जिनत बेगम उसे देखती रहीं।

उनका दिल बेचैन हो उठा

इबादत के रवैये से।

परेशानी और बढ़ गई थी...

क्योंकि इबादत ने एक साल का ड्रॉप लेकर

अब दोबारा कॉलेज में एडमिशन लिया था।

उसकी उम्र के बच्चे

तो बहुत आगे निकल चुके थे।

यहाँ तक कि उसकी अपनी दोस्तें भी

उसके इस बदले हुए बर्ताव से परेशान थीं।जीनत बेगम उसके बाथरूम जाने का इंतज़ार कर रही थीं।

वह जैसे ही बाथरूम के अंदर गईं,

तुरंत कमरे से बाहर चली गईं।

वहीं, इबादत झुकी हुई नज़रों से

पहले बाथरूम के चारों तरफ़ देखने लगी।

उसे बार-बार वह ख्वाब याद आ रहा था।

अकेले में जल्दी से अपने कपड़े निकाले,

दूसरे कपड़े पहने और हाथ अच्छे से धोए।

जैसे ही बाहर आई,

जीनत बेगम को वहाँ पर ना देखकर

वह घबरा गई।

जल्दी से दुपट्टे को

पूरी तरह सिर से लेकर नीचे तक कसकर ओढ़ लिया।

फिर दौड़ते हुए कमरे से बाहर निकली

और इधर-उधर देखने लगी।

सारे नौकर ही नज़र आ रहे थे,

ना तो जीनत बेगम कहीं दिखीं

और ना ही मेहमाल बेगम।

उसकी आँखें धीरे-धीरे नम होने लगीं।

इधर-उधर देखते हुए वह

तेज़ी से सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी।

उसके पैरों में बंधी पायल शोर कर रही थी।

नाक लाल हो चुकी थी,

मानो अपने जज़्बातों को दबाने की कोशिश कर रही हो।

उसके हाथ काँप रहे थे,

वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी।

जैसे ही आगे बढ़ी और नज़र उठाई,

सामने जुबैर साहब खड़े थे।

इबादत की रंगत उड़ गई।

चेहरे पर घबराहट और आँखों में डर साफ़ दिख रहा था।

जुबैर साहब ने तुरंत

उसे अपने सीने से लगा लिया।

"क्या हुआ बेटा?

तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?

कोई है पीछे?

किसी ने कुछ कहा है?

मुझे बताओ।"इबादत उन्हें देखकर झट से उनका हाथ पकड़ लेती है।

अपने आँसुओं को काबू करते हुए कहती है,

"वो... अब्बू, आप मुझे अकेला-अकेला छोड़कर मत जाइए।

मैं डर गई थी, मुझे बहुत डर लग रहा था।

अब आप कहीं मत जाइएगा।

पता नहीं, आम्मी बड़ी अम्मी कहाँ चली गईं..."

वह डरते हुए अपनी नज़रों को चारों तरफ़ घुमाते हुए

यह सब कह रही थी।

उस वक़्त वह बहुत ही डरी और घबराई हुई लग रही थी।

जुबैर साहब उसे वहीं अपने पास बिठाकर

परेशानी से देखने लगे।

वह पिछले एक साल से उसका यही रवैया देख रहे थे।

पूरा घर परेशान हो चुका था।

यहाँ तक कि वह अकेले कुछ भी नहीं करती थी।

उसे इतना डर था कि वह अकेले ड्राइवर के साथ

कॉलेज तक नहीं जाती थी।

उसकी सहेलि ही रोज़ उसे पिक और ड्रॉप करती थीं।

सिवाय एक शख़्स के...

जिससे उसे खौफ़ नहीं था,

बाकी हर शख़्स से वह डरती थी।

इतना ज़्यादा कि अगर नींद में भी उसे

ऐसा लगता कि कोई उससे दूर हो रहा है,

तो वह झट से उठ जाती थी।

और रात में भी चैन से सो नहीं पाती थी।Mehmaal बेगम, जो जीनत बेगम के साथ किचन में थीं,

दरवाज़े पर खड़ी होकर इबादत को देख रही थीं।

उनकी आँखें नम हो गईं।

वह लगभग रोते हुए बोलीं,

Bhabi क्या हुआ है मेरी बेटी को?

मुझे समझ नहीं आ रहा।

हमने उसका इतना इलाज करवाया है,

डॉक्टर, साइकोलॉजिस्ट तक के पास ले गए।

इतनी हार्ड दवाइयाँ खा रही है,

फिर भी उसे सुकून क्यों नहीं आ रहा?

हुआ क्या है?

कुछ बोलती ही नहीं है, बताती ही नहीं है..."

जीनत बेगम ने उन्हें सँभालते हुए कहा,

"तुम परेशान मत हो,

तुम्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।

हमारी बेटी बहुत जल्दी ठीक हो जाएगी।

कल जीहां आ जाएगा न,

देखना, वह पहले जैसी कर देगा हमारी इबादत को।

तुम परेशान मत हो..."

मेहमाल बेगम उनकी तरफ़ देखते हुए

परेशानी से बोलीं,

*"मुझे बहुत डर लग रहा है, भाभी...

बहुत ज़्यादा डर।

कहीं कुछ और न हो जाए।

मेरी अच्छी-ख़ासी, हँसती-खेलती बेटी को देखो...

कितनी चुप हो गई है।

पहले तो यह हवेली जैसे बात करती थी उससे।

दरवाज़े, खिड़कियाँ, दीवारें गूंज उठती थीं उसकी आवाज़ से।

और अब देखो...

कितनी ख़ामोश रहती है।

मुझे उसकी ख़ामोशी बहुत सताती है..."*

इबादत खामोशी से जुबेर साहब के करीब बैठी हुई थी। उसे देखकर लगा, जैसे वह डरी और घबराई हुई हो। उसके माथे पर शिकन थी। वह बिल्कुल चुपचाप बैठी थी, उसके मुंह से एक भी अल्फ़ाज़ नहीं निकल रहे थे।

जुबेर साहब खुद भी उसकी हालत देखकर परेशान हो चुके थे। तभी वहाँ जीनत बेगम आईं और दोनों की तरफ देखते हुए बोलीं,

"अच्छा चलिए, खाना खा लीजिए। वैसे भी कल सुबह तो आप वापस जा रहे हैं ना?"

इसके बाद उन्होंने इबादत की तरफ देखते हुए कहा,

"और हां, कल तुम हो सके तो कॉलेज मत जाना।"

इबादत उनकी तरफ देखती है और सर नफ़ी में हिलाते हुए कहती है,

"नहीं बड़ी अम्मी, कल मुझे एक असाइनमेंट सबमिट करना है, तो मेरा जाना ज़रूरी है।"

घरवालों ने उसे कई बार फ़ोर्स किया था कि वह उसके पास फ़ोन करे और बात करे। लेकिन उसने एक बार भी कॉल नहीं की। वह आहिस्ता से अपनी जगह पर उठी और सीधा डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गई।

वहीं दूर खड़ी मेहमाल ,बेगम अपनी बेटी को देख रही थीं। उसके चेहरे पर कुछ भी बदलाव नहीं था। वह खामोश थी, बिल्कुल ऐसे जैसे बर्फ़ की ठंडी गुड़िया बन गई हो। अपनी बेटी की इस हालत को देखकर वह बेहद परेशान थीं।

कुछ देर बाद सभी लोग इकट्ठा होकर अपना-अपना डिनर पूरा करते हैं और अपने-अपने कमरों में चले जाते हैं।

पर इबादत अभी भी वहीं, किचन के कोने में खड़ी होकर अपनी मम्मी को देख रही थी। उसने धीरे और बहुत प्यार से कहा,

"अम्मी, चलिए ना… नींद आ रही है। बाकी काम मुलाज़िम कर लेंगे। आप यहाँ क्या कर रही हैं?"

ऐसा लग रहा था, जैसे वह खुद को संभालने की कोशिश कर रही हो।

मेहमाल बेगम सख्त नज़र से उसे देखते हुए अचानक चिल्लाईं,

"हुआ क्या है तुम्हें? आखिर कैसी हालत बना ली है तुमने अपनी! और इतनी धीमी आवाज़ में तुम कब से बोलने लगी? तुम्हें दिख नहीं रहा है कि हम सब कितने परेशान हैं तुम्हारी वजह से?"

वह आगे बोलीं,

"और तुम अकेले कमरे में क्यों नहीं रह रही हो? किस चीज़ का खौफ़ है तुम्हें? यहाँ घर वाले ही तो हैं, फिर इतना ज़्यादा क्यों डर रही हो? कौन डरा रहा है तुम्हें? तुम अकेले क्यों नहीं रहती? क्यों अपना कमरा छोड़ दिया है?"

उन्होंने बहुत गुस्से में उस पर चिल्लाते हुए कहा।

इबादत की आँखों में आँसू आ गए। वह जल्दी से अपने आँसू पोंछते हुए धीमे से बोली,

"आपको मेरे साथ नहीं जाना तो सीधा बोल दीजिए ना… आप मुझसे परेशान हो गई हैं। नहीं रुकूँगी मैं आपके पास। मैं जा रही हूँ अपने कमरे में।"वो भागते हुए अपने कमरे की तरफ आए। यह वही कमरा था जिसमें वह सिर्फ कपड़े बदलने या कुछ सामान लेने ही आया करती थी। उसने इस कमरे का रुख करना तक बंद कर दिया था।

जैसे ही कमरे के अंदर आई, सब कुछ पहले जैसा ही था। उसने जल्दी से कमरे की कुंडी अंदर से लगा ली और इधर-उधर देखने लगी।

अचानक उसकी नज़र बालकनी पर पड़ी। वह तुरंत उसके पास गई और पूरी बालकनी को अच्छे से लॉक कर लिया। अब वहाँ से न ताज़गी भरी हवा आ सकती थी, न सांस लेने तक की कोई जगह बची थी। उसने पूरे कमरे को अंदर से बंद कर लिया था।

वह इधर-उधर देख रही थी। उसके चेहरे पर घबराहट और डर साफ महसूस हो रहा था।

तभी उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके बिस्तर के नीचे हो। घबराहट के मारे उसने अपने पैर सिकोड़ लिए। उसका पूरा चेहरा पसीने से भीग गया था। वह लंबी-लंबी सांस ले रही थी, जैसे सांस लेना मुश्किल हो रहा हो।

आहिस्ता से उसने अपना पैर नीचे रखा और धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए एकदम झुककर बिस्तर के नीचे देखने लगी।

बिस्तर के नीचे एकदम खाली पड़ा हुआ था। वहाँ कुछ भी नहीं था।

फिर भी वह किसी अनजानी वजह से डरी हुई थी।

जब उसे तसल्ली हो गई कि वह इस कमरे में अकेली है, तो उसने साइड में पड़ा अपना बड़ा सा टेडी बेयर उठाकर सीने से लगा लिया।

उसने अपना चेहरा टेडी के सीने में छुपा दिया। उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। वह बहुत ज़्यादा डरी हुई थी।

घबराते हुए उसने कहा,

"या खुदा, मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? क्या मैं इतनी बुरी हूँ? कोई मुझे समझ क्यों नहीं रहा? मुझे अकेले रहने से डर लगता है। इतनी सी बात कोई क्यों नहीं समझता?"

वह काँपते हुए बोली,

"मुझे खौफ़ आ रहा है इस अंधेरे कमरे में। ऐसा लग रहा है जैसे सबकी नज़रें मुझ पर ही टिकी हुई हैं।"

उसका साँस लेना तेज़ हो गया था। जैसे उसका बीपी बढ़ रहा हो। वह अपने बाल नोच रही थी। उसका चेहरा आँसुओं से भीग चुका था।

रोते हुए वह बुदबुदाई,

"आपने मेरे साथ अच्छा नहीं किया। आप बिल्कुल अच्छे नहीं हैं। अगर आप मेरे साथ होते, मेरा फ़ोन उठाकर मुझसे दो मिनट बात कर लेते… तो मेरे साथ ऐसा नहीं होता।"

वह ज़ोर से सिसकने लगी,

"सब आपकी गलती है। मैं कभी ज़िंदगी में आपको माफ़ नहीं करूंगी। जयान जुबेर अख़्तर… आपको निकाह करना था ना किसी और लड़की से! अब शौक़ से कीजिए। लेकिन मैं… मैं आपके साथ नहीं रहूँगी। हरगिज़ नहीं रहूँगी।"

वह बुरी तरह से रो रही थी। उसे लग रहा था जैसे उसका दिमाग काम करना ही बंद कर चुका हो।इधर-उधर देखने के बाद, जब उसे लगा कि अब उसके सब्र का बाँध टूट चुका है, तो वह जल्दी से अपनी जगह से खड़ी हो गई और अपना ड्रेसर खोलने लगी।

ड्रॉअर खोलते वक्त ऐसा लग रहा था जैसे वह अटक गया हो। उसने बहुत कोशिश की, लेकिन मजाल थी कि उसके इतने ज़ोर लगाने के बावजूद वह ड्रॉअर खुले। उसकी घबराहट और बढ़ गई थी।

उसके माथे पर पसीना और तेज़ी से बहने लगा। नाखून ड्रॉअर के किनारे पर अटक गए और लकड़ी का पतला टुकड़ा उसकी उंगली में घुस गया। खून निकलने लगा, लेकिन उसे इसका एहसास तक नहीं हुआ। उसका ध्यान बस ड्रॉअर खोलने पर ही था।

आख़िरकार उसने ड्रॉअर खोल लिया और उसमें से बहुत सारी दवाइयाँ निकालकर बिस्तर पर पटक दीं। वह एक-एक करके सारी दवाइयाँ देख रही थी।

पिछले एक साल से वह यही सारी दवाइयाँ खा रही थी। उसने जल्दी से लगभग काफ़ी सारी गोलियाँ अपनी हथेली में रखीं और एक ही सांस में मुँह में डालकर पानी पी गई।

इसके बाद वह इधर-उधर टहलने लगी। उसकी साँसें सँभल नहीं रही थीं। वह घबराई हुई थी।

कुछ देर बाद उसकी आँखें भारी होने लगीं। वह धीरे-धीरे बिस्तर के पास आई और अपने टेडी को सीने से लगाकर आँखें बंद कर लेटी।

धीरे-धीरे उसकी साँसें थमने लगीं।कुछ देर पढ़ते-पढ़ते ही उसकी आँख लग चुकी थी। वह नींद में जा चुकी थी।

नींद में होने के बावजूद भी वह डरी हुई लग रही थी। उसकी पलकें बार-बार फड़फड़ा रही थीं। उसके हाथ काँप रहे थे। आँखों के किनारों से आँसू बह रहे थे। वह नींद में भी रो रही थी।

इसी तरह से रात गुजर गई।

Hello everyone to ye episode long diya hai to enjoy kriye or comments Krna na bhule ☺️ and jesa aap loog sooch rahe hai ki inki book jhook hogi pr thoda alg trha to bane rahiye or mje kriye

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