07

नजरो के दरमियान

करीब सुबह के 3:00 बजे उसकी अचानक आँख खुली। उसने इधर-उधर देखा। रात के 10:00 बजे वह सोई थी और बस पाँच घंटे भी उसकी नींद पूरी नहीं हो पाई थी।

वह जल्दी से बाथरूम के अंदर भागी और कुछ देर बाद कपड़े बदलकर बाहर आई। उसने जानमाज़ उठा ली और उसे बिछाकर नमाज़ अदा करने लगी।

जैसे ही उसने नमाज़ की नीयत बाँधी, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह रोना शुरू कर चुकी थी। वही डर उसके चेहरे पर साफ नज़र आ रहा था।

वह सजदे में गई और देर तक वहीं झुकी रही।

नमाज़ पूरी करने के बाद, वह अपने सजदे की जगह पर ही बैठी रही और रोते हुए कहने लगी

"खुदा… मेरी ज़िंदगी में ऐसे शख़्स को भेज दे जिसकी मौजूदगी में मुझे खौफ़ न हो। मुझे बहुत डर लग रहा है।"

कॉलेज जाने पर उसे हमेशा नापाक नज़रों का एहसास होता था। जैसे उसके वजूद पर धब्बा लग गया हो। उसे लगता था, मानो उसका दामन मैला हो गया हो।

वह सोचती,

"मुझे समझ नहीं आ रहा। मैं एक साल से कोशिश कर रही हूँ कि मेरी वजह से घर में किसी को परेशानी न हो। फिर भी… फिर भी मैं सबको परेशान कर रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे मेरा ही वजूद मेरा साथ नहीं दे रहा।"

वह रोते हुए बुदबुदाई,

"आप… आप तो मेरा साथ दें। तो हर चीज़ पर क़दर है ना। मुझे सब्र दे दीजिए।"

वह लगातार रो रही थी। उसके मुँह से आवाज़ तक नहीं निकल रही थी। रोते-रोते कब वह गहरी नींद में चली गई, उसे एहसास तक नहीं हुआ।

अब वह नमाज़ की पाबंद हो चुकी थी। तहज्जुद उसकी आदत बन गई थी। लेकिन दवाइयों का असर उस पर जैसे कम हो गया था। वह दवाइयाँ खाती थी, फिर भी उसे जल्दी नींद नहीं आती थी।

अकेले रहने से उसे बुरी तरह डर लगता था। अगर गलती से भी कोई लड़का उसके आसपास आ जाता, या फिर कोई ऐसा इंसान जिसे वह बिल्कुल नहीं जानती थी, तो उसका खौफ़ और बढ़ जाता था।

सुबह के करीब 8 बजे, अचानक दरवाज़ा पीटने की आवाज़ से उसकी नींद टूटी। दरवाज़े पर कोई बुरी तरह हाथ मार रहा था।इबादत आईने में अपना चेहरा देख रही थी और धीरे से बुदबुदाई,

"मुझे सुकून कोई नहीं पहुँचा सकता, सिवाय आपके। अगर मेरी नींद भी सुकून में जाती है, तो वह भी सिर्फ आपकी वजह से।"

यह कहते हुए उसने जल्दी से अपना दुपट्टा ओढ़ा और दरवाज़ा खोलने चली गई।

दरवाज़ा खुलते ही सामने पूरे घरवाले खड़े थे। पीछे दो मुलाज़िम भी मौजूद थे।

इबादत ने उन्हें सामने देखा तो ज़बरदस्ती अपने होंठों पर मुस्कान लाने की कोशिश की और धीमी आवाज़ में बोली,

"आप सब लोग सुबह-सुबह यहाँ? क्या हुआ?"

उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी, जैसे उसके अंदर की सारी ताक़त खत्म हो चुकी हो।

उसकी इतनी धीमी आवाज़ पर मेहमाल बेगम उसके क़रीब आईं और गुस्से से घूरते हुए बोलीं,

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? कब से हम लोग तुम्हारा दरवाज़ा बजा रहे हैं और तुम खोल ही नहीं रही थीं। कितने परेशान हो गए थे हम लोग… कहीं तुमने कुछ…"

उनकी आवाज़ अचानक गले में अटक गई। उनकी आँखों में आँसू आ चुके थे। उन्होंने इबादत को एक नज़र देखा। उसकी सही-सलामत हालत देखकर उन्हें थोड़ा सुकून मिला। बिना कुछ और कहे वह तुरंत आगे बढ़ गईं।

जीनत बेगम वहीं खड़ी रहीं। उन्होंने इबादत को देखते हुए नम आँखों से कहा,

"इबादत, तुम अपनी माँ को क्यों इतना परेशान कर रही हो? उनके पास तुम्हारे सिवा कोई नहीं है, कोई भी नहीं… जिसे वह अपना कह सकें। ख़याल रखा करो न बेटा अपना।"

वह भी मेहमाल बेगम के पीछे चली गई थी। उनकी आँखों में भी आँसू आ गए थे।

वह इबादत को अपनी बेटी की तरह मानती थीं। दो सालों में उन्होंने इबादत के पल-पल बदलते हालात और उसका रवैया देखा था। वह परेशान थीं, उतनी ही परेशान जितना एक माँ अपनी बेटी के लिए होती है।

उसी समय जुबेर साहब सामने खड़े इबादत को देख रहे थे। वह उसके साथ अंदर आए और उसके बिस्तर पर, उसके बगल में बैठ गए।

उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा,

"बेटा, कोई ऐसी परेशानी है जो तुम्हें अंदर ही अंदर खा रही है… तो मुझे बताओ न। तुम्हारे वालिद के बाद मैं ही तो हूँ। या फिर तुम मुझे अपना वालिद नहीं मानती?"

उन्होंने यह बात बड़ी मुश्किल से कही थी। उनकी अपनी ज़ुबान उनका साथ नहीं दे रही थी। वह खुद बहुत डर गए थे।

अब उनके पास अपने भाई की सिर्फ आख़िरी निशानी के तौर पर इबादत ही बची थी। अगर उसके साथ कुछ हो जाता… तो वह क्या करते? यही सोच उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।

इबादत ने अपने आप को संभालते हुए कहा,

"बड़े अब्बा, आप जानते हैं ना… मुझे अकेले रहने से डर लगता है। मैं कोशिश करके भी नहीं रह पा रही हूँ। मुझे पता है मेरी वजह से आप सब बहुत परेशान हैं। लेकिन मैं क्या करूँ… मुझे बहुत डर महसूस हो रहा है।"

यह कहते-कहते वह खुद ही रोने बैठ गई थी।

वह कुछ देर तक उसके आँसुओं को देखते रहे। फिर अपने हाथ आगे बढ़ाकर उसके आँसू पोंछे और बहुत प्यार से बोले,

"अगर कोई ऐसी बात है जो तुम्हें अंदर ही अंदर खा रही है, परेशान कर रही है… तो तुम मुझे बता सकती हो।

वरना… तुम्हारा शहर आ रहा है ना, तो मुझे ही बता दो।

लेकिन इस तरीके से मुझे परेशान मत करो।"

वह थोड़ी देर रुके और फिर नरम लहजे में बोले,

"मुझे समझ नहीं आ रहा, तुम्हें इतना ज़्यादा खौफ़ कब से लगने लगा है?

तुम तो वो हो जो खुद सबको हिम्मत देती थी।

तुम्हें अकेलेपन से क्यों डर लग रहा है?

तुम्हें तो कभी भी अकेलेपन से डर नहीं लगा था।"

उन्होंने गहरी साँस ली और कहा,

"मुझे यक़ीन है, कुछ हुआ है। तुम कुछ छुपा रही हो।

अगर मुझे नहीं बताना चाहती… तो उसे बता दो, जो सब सुनता है, सब देखता है, और सब पर क़ादिर है।

अगर तुम्हें लगता है कि कुछ हुआ है, या तुमसे कोई गलती हुई है, तो उससे माफ़ी माँग लो।

लेकिन इस तरह डर-डर कर जीने से कुछ भी नहीं होगा।"

उनकी आवाज़ भर्राने लगी,

"आज हम लोग हैं तुम्हारे साथ… कल अगर हम लोग न रहे, तो तुम कैसे जीओगी?

हम तो मरने के बाद भी क़यामत से गुज़रेंगे तुम्हें देखकर… क्योंकि खत्म सिर्फ जिस्म होता है, रूह नहीं।"

उन्होंने बड़े प्यार से उसे समझाने की कोशिश की थी।

इबादत उनकी बात पर सर हिलाते हुए अपने आँसू पोंछने लगी। फिर धीमे से बोली,

"आप फ़िक्र मत करें बड़े अब्बू। मैं… मैं पूरी कोशिश कर रही हूँ। मैं जल्दी ठीक हो जाऊँगी। फिर मुझे खौफ़ भी नहीं आएगा। बस… लोग मुझसे दूर रहेंगे तो मैं नहीं डरूँगी। सच्ची।"

जुबेर साहब कुछ देर तक उसे देखते रहे। फिर उसके माथे पर अपने होंठ रखते हुए बोले,

"मेरी प्यारी बच्ची… सब ठीक हो जाएगा। चलो, अब तुम जाकर जल्दी से तैयार हो जाओ। तुम्हारी दोस्त आने वाली होगी ना, तुम्हें पिक करने के लिए।"

इबादत उनकी तरफ देखती रही और फिर उठकर सीधे बाथरूम की तरफ चली गई।

उसके जाने के बाद, जुबेर साहब भी कमरे से निकलते हुए धीमे स्वर में खुद से कहने लगे,

"तुमने अच्छा नहीं किया ज़ाकिर…। इतनी छोटी सी थी वो, और तुम उसे छोड़कर कैसे जा सकते थे?

तुम्हें नहीं जाना चाहिए था। एक बेटी सबसे ज़्यादा क़रीब अपने बाप की होती है… और उसके बाद अपने शौहर के।

मुझे अफ़सोस है कि मेरा बेटा उसे उस क़ाबिल नहीं बना पाया।

सोचा था… तुम्हारी ख्वाहिश पूरी करके सब बेहतर हो जाएगा। इबादत हमारे घर सुकून से रहेगी।

पर देखा… ऐसा नहीं हुआ।

मुझे पता है, तुम भी सुकून से नहीं होगे।

लेकिन मैं कोशिश करूँगा… पूरी कोशिश करूँगा… कि वह ठीक हो जाए। पहले जैसी मुस्कुराती हुई हो जाए।"

यह कहते-कहते वह कमरे से बाहर निकल गए।कुछ देर बाद, इबादत तैयार होकर नीचे आई। इस वक्त उसने मेहरून रंग का कार्ड सेट पहन रखा था। दुपट्टा गले में डाला था और उसके साथ एक बड़ी सी चादर थी, जिसे उसने अभी सिर्फ़ हाथ में पकड़ रखा था।

वह जल्दी से नीचे आई और सबकी तरफ देखते हुए बोली,

"मेरा सामान आ गया होगा… मुझे जाना है। मेरा इंपॉर्टेंट असाइनमेंट है। मैं बाद में आती हूँ।"

वह जाने ही वाली थी कि उसकी नज़र मेहमाल बेगम पर पड़ी।

मेहमाल बेगम उसके लिए टोस्ट पर बटर लगाकर सैंडविच बनाकर प्लेट में रख चुकी थीं।

कुछ न बोलने पर इबादत को बड़ी तकलीफ़ हुई। उसने जल्दी से सैंडविच उठाया और फिर अपनी चादर को पूरे चारों तरफ फैलाकर ऊपर से ओढ़ लिया। इसके बाद तेज़ क़दमों से हवेली से बाहर निकल गई।

उसकी इतनी जल्दबाज़ी और हड़बड़ाहट देखकर सब लोग उसे देख रहे थे। लेकिन किसी ने भी एक लफ़्ज़ नहीं कहा।

जैसे ही वह हवेली से बाहर निकली, सामने एक काली, चमकती हुई गाड़ी खड़ी थी।

इबादत की नज़र गाड़ी पर पड़ी, और फिर ड्राइविंग सीट पर बैठे शख़्स पर।

उसे देखते ही इबादत के होठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई।

वह जल्दी से गाड़ी के अंदर बैठ गई और दरवाज़ा बंद कर लिया।माफ़ करना अयान भाई, 5 मिनट लेट हो गई… आगे से ध्यान रखूँगी।"

सामने फ्रंट सीट पर अब 25 26 साल का एक लड़का बैठा था। उसके बाल हल्के बिखरे हुए थे, माथे पर गिर रहे थे और चेहरे पर बेहद खूबसूरत-सा नूर था। उसके होंठ बिल्कुल पिंक से थे और हल्की दाढ़ी में वह कातिलाना लग रहा था।

उसने इस वक्त हाफ टी-शर्ट और ट्राउज़र पहन रखा था। उसे देखकर लग रहा था जैसे वह खुद भी जल्दबाज़ी में आया हो।

वहीं, इबादत के बगल में बैठी माला मुँह फुलाते हुए बोली,

"बस, अब यही रोज़ का रह गया है। ऐसा करो ना, तुम मुझे और मेरे भाई दोनों को ही अपना पर्सनल ड्राइवर बना लो। कब तक हम तुम्हें इस तरीके से पिक एंड ड्रॉप करते रहेंगे? ख़ुद से भी तो कुछ करो!"

इबादत उसकी तरफ देखते हुए उसे गले लगाती है और धीरे से कहती है,

"तुम तो जानती हो ना… मुझे डर लगता है। अगर तुम राज़ी नहीं होती कि तुम मेरे साथ रहोगी हर वक्त, तो शायद मैं आगे पढ़ाई भी नहीं करती। पर तुम थी जो चाहती थी कि मैं पढ़ाई जारी रखूँ… इसलिए ही तो मैं

उसके अल्फ़ाज़ रुक गए। वह खामोश हो गई।

सामने बैठा अयान, जो फ्रंट मिरर से इबादत की आँखों को देख रहा था, उनमें छुपी घबराहट और परेशानी साफ़ देख सकता था।

वह माला को सख़्त आवाज़ में कहता है,

"और तुम्हें मसला क्या हो रहा है? अगर हम इबादत को पिक और ड्रॉप कर रहे हैं तो"और वैसे भी, वह मेरी स्टूडेंट है… तो बेहतर होगा तुम उससे थोड़ी इज्ज़त से पेश आओ।"

अयान ने गहरी आवाज़ में कहा और फिर उसे घूर का वापिस अपना से आगे के लिया और आगे बोला

"और हाँ, एक बात और… जितनी ज्यादा गाड़ियाँ सड़क पर निकलती हैं, उतना ही एयर पॉल्यूशन होता है। अगर हम ख़ुद ही थोड़ा ध्यान रखेंगे तो नेचर अच्छा रहेगा। तुम्हें इतनी-सी बात समझ में क्यों नहीं आती? तुम क्यों हर बार इसके पीछे पड़ जाती हो? देखो… बिचारी डर गई ना अब!"

माला छोटा-सा मुँह बनाते हुए बोली,

"हाँ हाँ भाई, आपको देखकर तो ऐसा लगता है कि आप ही इबादत के सगे भाई हैं और मैं ही दुश्मन बनी बैठी हूँ। आप कभी मेरी साइड तो लेते ही नहीं।

आपको बोलना चाहिए था हाँ इबादत, हिम्मत रखो, अल्लाह से डरो… कोई भूत थोड़ी ना है जो तुम्हें खा जाएगा। बाकी हम हैं ना, अगर कुछ हो भी गया तो!

पर नहीं… आपको तो न जाने कौन-सा भूत चढ़ा हुआ है। बस इबादत के सिवा आपको कोई लड़की दिखाई ही नहीं देती… यहाँ तक कि अपनी खुद की बहन भी नहीं!"

उसने मुँह फुला लिया था।

इबादत कुछ देर उसे देखती रही, फिर अपने बैग से एक छोटा-सा बॉक्स निकालकर माला के हाथ में रख दिया।

"ये लो… तुम्हारे लिए स्पेशल बनाकर रखा था मैंने। अब चलो जल्दी-जल्दी खा लो, वरना तुम्हारा दिमाग फट जाएगा।"

बोलते हुए उसने अयान की तरफ देखा और हल्का-सा मुस्कुरा दी।अयान उसकी आँखों में हल्की चमक देख अपना सर सीट से टिका लेते हैं। उनके चेहरे पर सुकून उतर आया था।

कुछ देर बाद,

उनकी गाड़ी एक बड़ी-सी यूनिवर्सिटी के सामने आकर रुकती है।

माला जल्दी से गाड़ी से उतरते हुए कहती है,

"खुदा हाफ़िज भाई… बहुत लेट हो गया है आज तो। ऊपर से असाइनमेंट के लिए इतनी लंबी लाइन लगानी पड़ेगी।"

उसने एक हाथ से इबादत का हाथ थामा हुआ था। इबादत भी अयान को वैसे ही खुदा हाफ़िज कहती है और जल्दी-जल्दी वहाँ से निकल जाती है।

अयान अंदर की तरफ भागती हुई इबादत को देख रहा था। उसने लंबी-सी चादर डाली हुई थी, जिससे सिर्फ उसकी काली आँखें नज़र आ रही थीं। उसके सिवा उसका कोई अक्स तक नहीं दिख रहा था।

अयान भीड़ में उसे तब तक देखता रहा, जब तक उसका वजूद उसमें गुम नहीं हो गया।

कुछ देर बाद,

वह अपनी गाड़ी को रिवर्स गियर में डालते हुए वहाँ से निकल गया। उसकी गाड़ी की खिड़की पहले से खुली हुई थी, जिसे छूकर ठंडी हवा उसके बालों को सहला रही थी।

वह न जाने किस ख़याल में गुम था। वैसे ही बेसुध-सा अपनी गाड़ी चलाते हुए, धीरे से खुद से कहता है पहली बार तुम्हें देखा था… देखने के साथ ही दिल हार बैठा था।

और अब तुम्हारा यह डरा हुआ चेहरा मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।

क्या हुआ है इबादत? किसी से नहीं… मुझे तो बताओ।

क्यों तुम इतना खौफ़ खा रही हो?

सिर्फ तुम्हारे लिए, रोज़ तुम्हारे घर आता हूँ… ताकि तुम बेहतर महसूस कर सको।

पर तुम… तुम तो जैसे किसी अधूरी कहानी में गुम होती जा रही हो।

क्या तुम्हें मेरी आँखों में… अपने लिए कुछ महसूस नहीं होता?

क्यों नज़रअंदाज़ करती हो?

किस चीज़ का खौफ़ है तुम्हें?"

वह गाड़ी चलाते हुए बोल रहा था।

गाड़ी रिवर्स करने के साथ ही एक ब्लैक कलर की Rolls Royce कॉलेज के अंदर दाख़िल हुई।

उस गाड़ी के पीछे एक शख़्स बैठा हुआ था।

उसने इस वक़्त ब्लैक कलर का फ़ॉर्मल सूट पहना हुआ था, ऊपर जैकेट डाली थी।

हाथ में ब्रांडेड वॉच, पैरों में चमचमाते जूते, परफेक्ट सेट बाल… और आँखों पर स्पेक्स।

उसने अपनी घड़ी पर वक़्त देखा और एक नज़र कॉलेज कैंपस की तरफ़ डाली।

जहाँ सबकी नज़रें सिर्फ उसी गाड़ी पर टिक गई थीं।

आसपास जैसे एकदम हड़कंप-सा मच गया।

सभी लोग उस गाड़ी को देख रहे थे।

तभी ड्राइवर जल्दी से बाहर आया और बैक साइड का दरवाज़ा खोला।

पीछे से एक डार्क, डॉमिनेटिंग पर्सनालिटी बाहर उतरी।

एक हाथ में मोटी-सी किताब थामे हुए, वह बिना किसी एक्सप्रेशन के अंदर की तरफ़ बढ़ रहा था।उसके चलने का स्टाइल… उसका हर फ़ुटस्टेप, उसकी डार्क वाइब… देखने में वह बहुत ही क़ातिल लग रहा था।

वह आगे बढ़ रहा था और लड़कियाँ ही नहीं, बल्कि लड़के तक उसे रुक-रुक कर देख रहे थे।

लेकिन उस शख़्स को तो जैसे किसी से कोई मतलब ही नहीं था।

तभी उसे महसूस हुआ… जैसे एक जानी-पहचानी नज़र उस पर टिक गई हो।

उसके क़दम अचानक रुक गए।

उसने एक तेज़ नज़र चारों तरफ़ घुमाई।

पर वह नज़रें, जो कुछ देर पहले उसे छू गई थीं… अब जैसे ग़ायब हो चुकी थीं।

वह वजूद कहीं छिप गया था।

वह बिना कुछ कहे, वापस अपने क़दम आगे बढ़ा देता है।

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