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तलाक चाहिए

Jihaan उन्हें गहरी आंखों से देखते हुए अपना सर नफ़ी में हिलाते हुए कहा,

“हरगिज़ नहीं, मैं यहीं रहूंगा।”

यह कहते हुए वह किसी को कॉल करता है

और सीधा ऊपर की फ्लोर की तरफ बढ़ जाता है।

यह पहली बार नहीं था कि वह यहाँ आया हो।

यह वही फ़ार्महाउस था,

जिसे उसके चाचू ने इबादत और जिहान के बचपन में

खास उनके खेलने के लिए बनवाया था।

यहाँ पर हर चीज़ थी।

और उन दोनों ने अपनी मर्ज़ी से बगल-बगल वाले कमरे लिए थे।

घर वाले यह अच्छी तरह जानते थे

कि अगर दोनों एक ही चीज़ की ज़िद करते हैं,

तो उन्हें एक ही चीज़ चाहिए होती है।

क्योंकि इबादत छोटी थी,

उसे हर वह चीज़ चाहिए होती थी

जो जिहान के पास होती थी।

वह मुकम्मल तौर पर जिहान की हर चीज़ चाहती थी।

जब जिहान ने फ़ार्महाउस पर

सेकंड फ्लोर पर अपने लिए कमरा चुना था,

तो इबादत ने भी ज़िद की थी

कि उसे भी वही कमरा पसंद है।

वह भी वहीं रहेगी।

इस बात को पहले से समझते हुए

घर वालों ने उसके बगल वाला कमरा

इबादत की पसंद के हिसाब से सजा दिया था।

इबादत अपने कमरे में थी,

जबकि जिहान अपने कमरे में मौजूद था।

वह बालकनी के पास खड़ा होकर

अपने बगल वाले रूम की बालकनी देख रहा था।

उसने वहां से मेहमाल बेगम को जाते हुए देख लिया था।

न जाने उसके दिमाग में क्या आया कि वह बालकनी से कूदकर सीधा इबादत के कमरे में आ गया। उसे यकीन था कि बालकनी खुली होगी। उसने स्लाइडिंग डोर को धक्का दिया और अंदर आ गया।

उसके चेहरे पर जंग जीतने वाली मुस्कान थी। अंदर आते ही उसने सबसे पहले दरवाज़े को अच्छे से लॉक किया और जाकर वहां रखे हुए काउच पर पैर पर पैर चढ़ाकर बैठ गया।

अंदर से पानी गिरने की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। उसे पता था कि इबादत अभी नहा रही है। कुछ देर बाद इबादत कपड़े बदलकर बाहर आई। उसने गुलाबी रंग का हल्का, -सा सूट पहन रखा था। वह अपने गीले बाल सुखा रही थी।

जैसे ही उसकी नज़र बेड की तरफ गई और वहां मेहमाल बेगम को न पाकर, उसने टॉवल लगभग बेड पर फेंका और सीधा दरवाज़े की तरफ भागती हुई चिल्लाई

“अम्मी, आप क्यों चली गईं? मैंने कहा था ना कि आप यहीं रहना।”

वह दरवाज़ा खोल ही रही थी कि अचानक उसे एहसास हुआ जैसे किसी की गर्म साँसें उसकी गर्दन को छू रही हों। उसका पूरा शरीर डर से ठंड पड़ गया।

उसके गीले बाल, जो पहले से ही चेहरे पर बिखरे हुए थे, और ज़्यादा चेहरे पर लटक गए। उसने धीरे-धीरे अपना सर पीछे की तरफ घुमाया। उसे सिर्फ़ जिहान की ठोड़ी दिखाई दी।

उसमें इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि सर उठाकर ऊपर देख सके कि उसके पीछे कौन खड़ा है। उसका चेहरा डर से पिला पढ़ गया था। पूरा शरीर जैसे जान निकलने वाली हो वो हिल तक नहीं पाई थी

वही जीहां जिसे अभी इबादत का चेहरा नहीं दिखा था वो वैसे ही उसके कान के पास झुक अपनी सख़्त आवाज़ में उसने कहा

“तुम लड़कों से दूर रहोगी। तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई मेरी मौजूदगी के बावजूद किसी लड़के के करीब जाने की, उसके सीने से लगने की?”

इबादत डर और घबराहट से पूरी तरह सफ़ेद पड़ चुकी थी। जीहां की आवाज़ सुनते ही वह तुरंत उसकी तरफ पलटी। जीहां बिल्कुल उसके पास खड़ा था।

उसके दोनों हाथ दरवाज़े पर टिके हुए थे और उसका चेहरा इबादत के चेहरे के क़रीब झुका हुआ था। इबादत के गीले बाल उसके गले और चेहरे को ढक रहे थे।

वह गहरी, स्याह आँखें… jihaan उन्हें इस तरह देख रहा था जैसे उनमें डूब जाना चाहता हो।

वह आगे बढ़ा, अपना हाथ उठाकर उसके चेहरे से लटों को कान के पीछे करने ही वाला था कि उससे पहले इबादत ने तेज़ी से उसका हाथ पकड़ लिया।

पूरी ताक़त से उसे दूर धकेलते हुए बोली

“आपकी हिम्मत भी कैसे हुई मुझे छूने की! मैंने कहा था ना, मुझसे दूर रहिए।”

इतना कहकर वह तुरंत दरवाज़ा खोलने लगी, लेकिन न जाने कैसे दरवाज़ा अटक गया था। वह खुल ही नहीं रहा था।

इबादत घबराकर बार-बार दरवाज़े को धक्का देने लगी। उसकी सांसें तेज़ हो रही थीं।

उसके एक धक्के से जीहां कुछ कदम पीछे हट गया।

पर वह कहां इतनी आसानी से बाहर जाने वाला था। गुस्से से उसकी आंखें सुर्ख हुई थी । आखिर वो कैसे बर्दाश्त कर सकता था कि उसे को खुद से यूं झटक दे ऊपर से सामने खड़ी लड़की जब उसकी हक हलाल की बीवी हो ये उसके बर्दाश्त के बाहर की चीज उसके साथ हुई थी

उसने तुरंत इबादत का बाजू पकड़कर उसे अपनी तरफ घुमा लिया। उसका मीटर जो घूम गया था वो

अपने दोनों हाथ उसकी कमर पर रखते हुए, उसे ज़बरदस्ती अपने बेहद क़रीब कर लिया।

ओर गुस्से से बोला

“क्यों? क्यों मैं तुम्हें टच न करूँ? तुम्हें वह अयान पसंद आ गया है क्या? जो हॉस्पिटल में भी तुम उसी के गले लगी हुई थीं।” उसके जेहन mei reh रह कर अयान का ख्याल। आ रहा था भला कैसे उसकी बीवी किसी गैर मर्द को छू सकती थी और वो नजरा उसके दिल को जला नहीं रहा था बल्कि उसके दिल को खाक कर चुका था । वो अपनी जलन एक लम्हे भी नहीं छिपा पाया था और इबादत पर सवाल दाग चुका था ।

इबादत की सांसें बुरी तरह तेज़ हो चुकी थीं। वह उसके सीने पर मुक्के बरसाते हुए चिल्लाई

“आपको समझ नहीं आ रहा? मैंने कहा ना, मुझसे दूर रहिए! सुना आपने? दूर हटिए! मुझे छोड़िए, मुझे जाना है।”

उसकी नज़रें चुर रही थीं। घबराहट में पसीना उसके माथे पर झलक आया था। डर उसके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रहा था।

जीहां ने उसके डर से भरे चेहरे को एक हाथ से थाम लिया और धीमे, मगर सख़्त लहजे में बोला

“तुम इतना घबरा क्यों रही हो? और तुम्हें खौफ़ कब से आने लगा? मुझसे तुम तो कभी नहीं डरती थीं। … और ये डर किस बात का है? कहीं तुम्हें डर तो नहीं कि मेरे पीठ पीछे तुम किसी और के साथ गुल खिला रही थीं… और अब मेरे आने के बाद वह मुकम्मल नहीं हो पाएगा?”

उसके इन अल्फ़ाज़ों पर तो जैसे इबादत बुरी तरह चीख पड़ी। उसने पूरी ताक़त से उसे खुद से दूर धकेला और उसके गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया।उस पल जिहां जैसे सांस ही नहीं ले पाया था। मानो उसका लम्हा रुक गया हो।

इबादत की आँखों में अंगारे थे। वह चिल्लाई

“क्यों? क्यों आए हैं आप वापस? आपने कहा था ना कि जाने के बाद मुझे छोड़ देंगे! फिर क्यों आए हैं? और ये कैसी बेहूदा हरकत कर रहे हैं मेरे साथ?

मैं चाहे जो करूँ, आपको इसमें दख़ल देने की कोई ज़रूरत नहीं है। मुझे नफ़रत है आपसे, आपके इस वजूद से, आपके होने से। आप… आप मुझे तलाक़ दे दीजिए। वरना… वरना मैं ख़ुद ही ख़ुला ले लूंगी!”

बोलते हुए वह बुरी तरह हाँफ रही थी। उसकी सांसें बहुत तेज़ थीं।

जिहां अभी भी उसी तरह खड़ा हुआ था। उसकी आदत ही ऐसी थी अगर उसे किसी चीज़ के लिए मना करो तो वह उल्टा वही करता था। और इबादत का उसे इस तरह खुद से दूर करना उसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ। ऊपर से जो उसने किया था वो उसका हिसाब लिए बिना कैसे छोड़ सकता था

वह अचानक आगे बढ़ा, उसके गर्दन के चारों ओर हाथ डालकर उसे अपने बेहद क़रीब कर लिया।

इबादत की आँखें डर से फैल गईं। वह उसे पूरी ताक़त से खुद से दूर करने की कोशिश कर रही थी।

जिहां उसके और क़रीब आते हुए धीमे, मगर ठंडी आवाज़ में बोला

“तुम्हें मुझसे तलाक़ चाहिए ना? तो सुन लो… चाहे तुम कुछ भी कर लो, तलाक़ तो मैं तुम्हें दूँगा नहीं।

तलाक़ देने से पहले मैं तुम्हारे इतना क़रीब आऊँगा कि तुम्हारी आँखों से असली आँसू निकलेंगे। और हाँ… दो साल हो गए ना हमारे निकाह को? अब रुकसती का भी वक़्त आ गया है। देखो, मैं कैसे तुम्हारी रुकसती करवाता हूँ

जीहां उसके इतने क़रीब था कि दोनों की सांसें आपस में टकरा रही थीं।

जिहां की गर्म, तेज़ सांसें और उसकी आँखों की तीखी नज़रें इबादत अपने चेहरे पर महसूस कर रही थी। उसका रंग उड़ चुका था। उसकी सांसें और ज़्यादा तेज़ हो रही थीं। उसका दिमाग़ जैसे दर्द से फट रहा था।

वह काँपते हुए आवाज़ में बोली

“ख़ुदा… ख़ुदा के लिए मुझे छोड़ दो। मैंने कहा ना, मुझसे दूर रहो। तुम्हारा मुझ पर कोई हक़ नहीं है। देखो… मुझे मत छुओ… मत छुओ…”

कहते-कहते उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका सर लुढ़ककर जिहां के कंधे से टिक गया। उसके हाथों की पकड़ ढीली हो गई और उसका शरीर एकदम शांत हो गया।

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