जिहां, जो अभी कुछ पल पहले गुस्से में था, उसे इस क़दर बेहोश होते देख चौंक गया। वह तुरंत उसे अपनी बाहों में उठाकर बेड पर लेटाया।
उसने उसके गाल थपथपाते हुए कहा
“मुझे पता है, तुम नाटक कर रही हो। मेरे साथ ज़्यादा नाटक करने की ज़रूरत नहीं है।”
वह तुरंत पास रखे जग से पानी उठाकर उसके चेहरे पर डालने लगा। लेकिन इबादत बेहोश हो चुकी थी।
तभी बाहर से दरवाज़ा बजाने की आवाज़ आई।
“इबादत! क्या कर रही हो तुम? अभी तक नीचे नहीं आई? मैंने कहा था ना, फ्रेश होकर नीचे आ जाना।”
ये जीनत बेगम की आवाज़ थी।
अंदर, जिहां परेशानी से इबादत को उठाने की कोशिश कर रहा था। उसने इधर-उधर देखा, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
“इबादत इतनी कमज़ोर तो नहीं थी… कि मेरे ज़रा-सा चिल्लाने या पकड़ने से ही यूँ बेहोश हो जाए…”
न जाने उसके दिमाग़ में क्या आया कि उसने जाकर सीधा दरवाज़ा खोल दिया।
जीनत बेगम उसे यूँ इबादत के कमरे में देखकर तुरंत अंदर आ गईं। उसे देखते ही बोलीं
“तुम… तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तुम तो वापस जाने वाले थे ना?
अम्मी … वो सब छोड़ो, पहले ये बताओ, ऐसे क्या हुआ? ये बेहोश कैसे हो गई?”
जीनत बेगम की आँखें हैरानी से बड़ी हो गईं। वह तुरंत इबादत के पास जाकर उसके गाल थपथपाने लगीं।
“इबादत… उठो बेटा…”
पीछे खड़े जिहां की तरफ देखते हुए उन्होंने कहा
“नीचे टेबल पर दवाइयों का लिफ़ाफ़ा पड़ा है, तुम जाकर उसे लेकर आओ। उसने मेडिसिन नहीं ली है, इसी वजह से इसकी हालत इतनी ख़राब हो रही है।”
जिहां तुरंत नीचे गया और पैकेट उठाकर सीधे कमरे में लेकर वापस आ गया।
उस वक़्त मेहमाल बेगम पहले ही किचन में थीं और जुबेर साहब हवेली गए थे। फ़ार्महाउस में कोई और नहीं था, इसलिए किसी ने भी जिहां को आते-जाते नहीं देखा।
जीनत बेगम भी कमरे में इधर-उधर देख रही थीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब इबादत को दवाई कैसे खिलाएँ।
उन्होंने जिहां की तरफ देखा।
जिहां, खुद को इस तरह देखते पाकर, कन्फ्यूज़न से बोला
“क्या हुआ? आप मुझे इस तरह क्यों देख रही हैं?”
जीनत बेगम ने उसके हाथ में दवाई रखते हुए कहा
“तुम ये दवाई खिलाओ।”
जीहां की आँखें बड़ी हो गईं। उसने खुद की तरफ़ इशारा करते हुए हैरानी से कहा
“मैं? मैं कैसे खिलाऊँगा?”
जीनत बेगम ने इबादत को साइड से सहारा देकर बैठाया। उन्होंने दवाई को आहिस्ता से अपनी उंगलियों के बीच में पकड़कर, गिलास में थोड़ा सा पानी डालकर उसमें घोल दिया।
फिर गिलास को इबादत के होठों से लगाते हुए, धीरे-धीरे उसके गले को सहलाने लगीं ताकि दवाई नीचे उतर जाए।
दूसरी तरफ़ से, जीहां ने जल्दी से इबादत को सहारा दिया ताकि वह आराम से बैठ सके।
दवाई खिलाने के बाद जीनत बेगम ने उसे धीरे से लेटा दिया और उसके सर को सहलाने लगीं।
जीहां उनकी तरफ़ देख रहा था। ना जाने उसे क्या हुआ कि वह पूछ बैठा
“मम्मी… ये हुआ क्या है? ये किस चीज़ की दवाई ले रही है? और डॉक्टर ने कल कहा था कि इसने डोज़ ज़्यादा ले लिया, इसलिए बेहोश हो गई। तो आप मुझे बताएंगी आखिर घर में चल क्या रहा है?”
जीनत बेगम की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें भी ठीक-ठीक कुछ नहीं पता था कि असल में हुआ क्या है।
वह जीहां को देखते हुए बोलीं
“मुझे खुद नहीं पता बेटा, क्या हुआ है। तुम्हारे जाने के बाद सब कुछ अच्छा चल रहा था। पर एक दिन… एक दिन इबादत की तबीयत अचानक बहुत ज़्यादा खराब हो गई।
हम लोग उसे घर पर छोड़कर गए थे, ये कहकर कि अपना ख्याल रखना। और हम अर्जेंट में निकले थे। वो अपने कॉलेज की तरफ़ से किसी ट्रिप पर गई थी…”
“उस दिन ना जाने ऐसा क्या
हुआ था… उस दिन से मेरी बच्ची बदल गई। जब हम घर पर आए तो हमें वो अपने कमरे में बेहोश मिली।
उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उसने ख़ुदकुशी करने की कोशिश की हो। पर… वो तो ऐसी नहीं थी ना। तब से वो डरी-डरी, सिमटी-सिमटी सी रहती है।”
जीहां को कुछ समझ नहीं आ रहा था। क्योंकि एक साल के बाद, सबसे पहले उसी दिन इबादत का कॉल आया था। कॉल पर भी उसने कुछ कहने की कोशिश की थी, लेकिन जीहां ने उसकी कोई बात नहीं सुनी थी।
वह परेशान हो गया। इबादत की हालत देखकर ना जाने उसके मन में क्या चल रहा था। वह चुपचाप वहाँ से चला गया।
कुछ देर बाद जीनत बेगम भी वहाँ से निकल गईं।
शाम तक इबादत को होश आ चुका था। वह नीचे अपनी अम्मी के साथ गार्डन में बैठी थी। उसने अपना सर उनकी गोद में रखा हुआ था और महमाल बेगम उसके सर को सहला रही थीं।
इबादत ने बिना उनकी तरफ देखे धीरे से कहा
“अम्मी… आपसे एक बात पूछूँ?”
मेहमाल बेगम ने प्यार से उसका चेहरा सहलाते हुए कहा
“तुम्हें मुझसे कुछ पूछने के लिए इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है, बेटा। तुम्हें जो पूछना है, तुम बेहिचक बोल सकती हो।”
इबादत की आवाज़ हल्की और धीमी पड़ी थी। उसने कहा
अम्मी… हमारी ज़िंदगी कहानियों की तरह क्यों नहीं होती? आपको पता है, वहाँ आख़िर में सब अच्छा हो जाता है। सारे दुख ख़त्म कर दिए जाते हैं, बिछड़ों को मिला दिया जाता है और हर आँसू के बदले खुशियाँ दे दी जाती हैं।
पर हक़ीक़त में ऐसा क्यों नहीं होता? क्यों जब दर्द मिलता है तो दर्द देने वाला ज़ालिम बन जाता है? क्यों जब तकलीफ़ होती है तब हम कुछ बोल नहीं पाते? क्यों जब हमें अपनो की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तब वही हमें छोड़ देते हैं?”
इबादत ने अपनी आँखें बंद करते हुए कहा
“आपको पता है अम्मी, अगर मेरे बस में होता, तो मैं एक ऐसी कहानी का हिस्सा बन जाती, जहाँ एक वक़्त के बाद सब मिल जाता।”
मेहमाल बेगम ने आह भरते हुए कहा
“पर बेटा… हक़ीक़त में सबको सब कुछ नहीं मिलता। यहाँ सब अच्छे नहीं होते, सबके नसीब अल्लाह एक जैसे नहीं लिखते। कुछ बेटियों के नसीब सिर्फ़ स्याह कलम से लिखे जाते हैं।
और वो हर उस चीज़ के पीछे जाती हैं, जिसे वो अपनी ज़िंदगी में चाहती हैं। मगर वो भूल जाती हैं कि वो एक मामूली-सी लड़की हैं… जिनके लिए कोई शहज़ादा नहीं आता, जिनके आँसू कोई नहीं देखना चाहता, जिनकी खुशियाँ ज़्यादा दिनों तक टिकती नहीं।
वो तो एक आम मख़लूक़ हैं, जिनकी क़िस्मत में आँसू उनकी ज़िंदगी के साथ ही उसी स्याह कलम से लिख दिए जाते हैं।”
फिर उन्होंने इबादत की तरफ़ देखते हुए कहा
“मेरी बच्ची… पर तुम ये सब क्यों सोच रही हो?”
इबादत जो उनकी बात सु ये हुए उन्हें देख रही थी उनके पूछने पर आंखें बंद कर खुद से कहती है कैसे बताऊँ आपको अपने तन्हा दिल का राज़, अम्मी… आप सह नहीं पाएंगी।
जिन बेटियों के सर से वालिद का साया हट जाए, उन्हें दुनिया अपनी जागीर समझती है।
कैसे बताऊँ अम्मी… आपको, कि जिससे निकाह किया था, वो मुहाफ़िज़ बनने की जगह मुझे रुसवा कर गया।
कैसे बताऊँ अम्मी… कि जिसके ख़्वाब अब्बा के साथ मिलकर सजाए थे, वही मेरी ज़िंदगी भर का ग़म मेरी ज़िंदगी में लिख गया।
कैसे बताऊँ अम्मी… कि आपकी बेटी पल-पल मर रही है।
कैसे बताऊँ… कि इस चेहरे के पीछे क्या छुपाए बैठी है।
कैसे बताऊँ अम्मी… आप सह नहीं पाएंगी। मैं… मैं मर जाऊँगी, अम्मी… मैं मर जाऊँगी…”
मेहमाल बेगम घबराकर बोलीं
“क्या हुआ लाडो? क्या सोच रही हो? बताओ अपनी अम्मी को, बताओ…”
इबादत ने उनकी तरफ़ देखा और हल्के से सर हिलाते हुए बोली
“नहीं… मुझे कुछ भी नहीं। बस… ऐसे ही कोई याद आ गया था।”
बोलते हुए उसने बहुत सफ़ाई से अपनी आँखों में आए आँसू छुपा लिए।
वह धीरे से अपनी जगह से उठकर बैठ गई और नज़रें डालते हुए सूरज को देखने लगी।
उसी वक़्त, जीहां जो अभी-अभी अपने ऑफ़िस से वापस आया था इबादत की हर बात सुन चुका था।
न जाने उसके दिमाग़ में क्या चल रहा था, लेकिन वह सीधा जीनत बेगम के पास आ गया।उनकी तरफ़ देखते हुए जीहां बोला
“अम्मी, मैं चाहता हूँ कि आप इबादत की रुख़्सती करवा दें। दो साल हो गए हमारे निकाह को… अब वह मेरे साथ रहेगी।”
जीनत बेगम हैरानी और ख़ुशी के मिले-जुले भाव से बोलीं
“पर बेटा, इबादत की तबीयत अभी कुछ ठीक नहीं है… और तुम उसे…”
जीहां ने उनकी बात काटते हुए कहा
“आप जानती हैं, उसे मुझसे बेहतर कोई नहीं संभाल सकता। और आप लोग भी तो फिक्रमंद रहते हैं। अब फिक्र करने की नहीं है, अम्मी… आपकी उम्र है ख़ुश रहने की। जब वह मेरे हिस्से में आ जाएगी, तब मुकम्मल तौर पर मैं उसे संभाल लूँगा। आप अब उससे बात कीजिए।”
यह कहकर वह बिना आगे कुछ सुने तुरंत वहाँ से निकल गया।
वहीं, इबादत… जो दरवाज़े पर खड़ी थी, उसने जीहां की एक-एक बात सुन ली थी। उसकी मुट्ठियाँ मज़बूत हो गईं। उसका बस चलता तो जाकर अभी जीहां का गला दबा देती।
ख़ुद को किसी तरह शांत करते हुए, वह धीमे कदमों से अपने कमरे की तरफ़ बढ़ी। दरवाज़ा पहले से ही खुला हुआ था।
अंदर झाँककर देखा, तो वहाँ कोई नहीं था।
वह ऐसी ही हो गई थी
अगर घर के लोग ही साथ हों, तो सुकून से रहती थी, लेकिन जैसे ही कोई और… यहाँ तक कि कोई नौकर भी मौजूद हो, तो वह घबरा जाती थी… डर जाती थी।वैसे ही कमरे के अंदर जाते ही, उसकी नज़र जीहां पर पड़ी।
वह अभी-अभी नहा कर बाहर आया था। गीले बाल माथे पर बिखरे हुए थे। नहाने की वजह से उसकी रंगत हल्की-सी बदल गई थी।
उसकी लंबी पलकें भीग चुकी थीं, और उसके मज़बूत बदन पर हर जगह ठंडे पानी की बूंदें जमी हुई थीं।
इस वक़्त वह देखने में बहुत ही हॉट लग रहा था।
इबादत उसे देखती रह गई।
कमरे में दाख़िल तो हो गई थी, मगर उसके कदम वहीं थम गए।
वह अब भी दरवाज़े के हैंडल को अपने हाथ में पकड़े खड़ी थी।
उसे देखकर उसकी सांस थम-सी गई थी।
वह तुरंत पीछे पलटकर वहां से जाने की फिराक़ में थी कि…
उससे पहले जीहां आगे बढ़ा और उसकी कलाई पकड़ ली।
उसने उसे ज़ोर से खींचा और दरवाज़े को अंदर से बंद कर लिया।



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