17

मेरी कुर्बत

इबादत उसकी हरकत पर गुस्से से बोली

“ये क्या बदतमीज़ी है? मेरा हाथ छोड़िए! मैंने कहा, मेरा हाथ छोड़ दीजिए!”

जीहां, जो उसे ऊपर से नीचे तक देख रहा था, चुप ही रहा।

वह वैसे ही उसके और क़रीब आया।

बहुत ही नर्मी और आशिकी से उसके कानों के पास झुककर बोला

“और अगर ना छोड़ूँ तो?”

इबादत ने घबराते हुए कहा

“तो… तो मैं शोर मचा दूँगी!”

उसकी ये प्यारी-सी धमकी सुनकर jihaan के लबों पर मुस्कान आ गई।

वह और पास झुकते हुए अपना चेहरा उसके चेहरे के क़रीब ले आया।

फिर उसने अपने गीले बाल हल्के से झटक दिए, जो इबादत के चेहरे को छू गए।

इबादत की आँखें अपने आप बंद हो गई थीं।वह तुरंत अपना हाथ छुड़ाते हुए गुस्से से बोली

“मैंने कहा मेरा हाथ छोड़िए! आपको भले ही शर्म ना हो कि आप किस हालत में खड़े हैं, पर मुझमें है!”

बोलते हुए वह अपनी कलाई छुड़ाने लगी।

जीहां ने आगे बढ़कर उसकी कलाई और मजबूती से खींच ली।

इबादत सीधा उसके सीने से जा लगी।

जिहां का सीना भीग हुआ था, और उस पर जमी पानी की बूंदें अब इबादत को भी भिगो रही थीं।

वह धीमी आवाज़ में झुककर बोला

“बीवी हो मेरी… तुम्हारे सामने मैं इस तरह आ सकता हूँ।

और रही बात चिल्लाने की तो बेशक चिल्लाओ, क्योंकि अब तुम्हारे चिल्लाने के दिन आ चुके हैं… बीवी।”

इतना कहकर वह उसके चेहरे के बेहद क़रीब झुक गया।

इबादत की सांसें थम-सी गईं।

वह बमुश्किल अपनी आवाज़ निकाल पाई और हकलाकर बोली

“ये… ये आप क्या कह रहे हैं? देखिए, आप जो कर रहे हैं वो सही नहीं।

और आप… आप जाकर सीधा बड़ी अम्मी को इनकार कर दीजिए।”

जीहां, जो इबादत को गहराई से देख रहा था, उसकी ये बात सुनकर हल्के से मुस्कुराया।

उसकी भौंहें हल्की-सी ऊपर उठीं।

फिर उसने अपना एक हाथ धीरे से उसके चेहरे पर ले जाकर उसके बालों को कान के पीछे किया।

करीब झुकते हुए बेहद नर्मी से बोला

“और तुम्हें क्यों लगता है कि मैं ऐसा करूँगा?”इबादत ने उसकी ठंडी उंगलियों को अपने चेहरे पर महसूस किया और वापस अपनी आंखें बंद कर लीं।

उसे घबराहट हो रही थी, उसे फिर से डर लग रहा था।

यह वही डर था, जो किसी की करीबी पर उसे हुआ करता था।

उसकी आंखों में आंसू आ गए।

वह धीरे से बोली

“मुझे… मुझे आपके साथ नहीं रहना।

आपने… आपने कहा था कि आप मुझे डिवोर्स दे देंगे।

आपको तो नफरत है ना, मेरे बदन से, मेरे वजूद से, मेरे से, मेरी मौजूदगी से।

मैं आपके साथ खड़ी रहूँगी तो लोग कहेंगे कि आपने मुझ पर एहसान किया। मुझ से ये सब नहीं सुना जाएगा , आप मुझे बख्श दिया।

मुझे आपका एहसान नहीं चाहिए… मुझे छोड़ दीजिए।

मुझे आपके साथ नहीं रहना।”

उसकी आवाज़ काँप रही थी, साँसें तेज़ और उखड़ी हुई थीं।

इबादत की इस हालत पर जिहान की आंखें और गहरी हो गईं।

वह धीरे से आगे बढ़ा और अपने ठंडे होंठ उसके गाल पर रख दिए।

इबादत, जो अभी घबराई हुई थी, उसका शरीर ढीला पड़ने लगा।

उसकी सांसें धीरे-धीरे नॉर्मल होने लगीं।

वह बड़ी-बड़ी आंखों से जिहान को देखने लगी,

जिसने अब भी उसके गाल पर अपने ठंडे होंठ टिकाए हुए थे।

इबादत की पकड़ उसके कंधों पर और मजबूत हो चुकी थी।

उसका चेहरा बिल्कुल सुर्ख पड़ गया था।

जिहान ने उसके बदलते रंग को देखा,

तो उसके होठों पर हल्की, तिरछी मुस्कान उभर आई।

वह वैसे ही अपने गाल को उसके गालों से आहिस्ता-आहिस्ता रगड़ते हुए बोला

“अभी भी चाहती हो कि मैं तुम्हें डिवोर्स दे दूँ?

मेरी कुर्बत , तुम्हारे रुखसार पर यह रंग चढ़ा रही है …

और तब भी तुम मुझसे डिवोर्स माँग रही हो?”

इबादत तुरंत होश में आई और पूरी ताक़त से उसे दूर धकेलते हुए बोली

“मुझे आपके साथ नहीं रहना! आपको समझ में नहीं आती इतनी सी बात?

और वैसे भी… आपको तो किसी और लड़की से लगाव है।

आपने खुद कहा था।

अब आप मेरे साथ भी वही चक्कर चलाना चाहते हैं।

पर आप शायद भूल रहे हैं…

मैं इबादत हूँ!

मैं आपकी इन मीठी-मीठी बातों में नहीं आने वाली।

बड़ी अम्मी, बड़े अब्बू चाहे कुछ भी कहें,

मैं तो आपसे डिवोर्स लेकर ही रहूँगी।”

यह कहते हुए उसने गहरी सांस भरी और जिहान की तरफ देखा।

जिहान हल्के क़दमों से उसके और करीब आया।

उसने उसके दूसरे गाल पर भी अपने होंठ रख दिए और धीमे से मुस्कुराते हुए बोला

“अच्छा… डिवोर्स चाहिए?

ठीक है, कोशिश करनी है तो कर लो।

मैं तुम्हारा पूरा सपोर्ट करूँगा…

लेकिन साइन?

वो कैसे लगेंगे?”

इबादत की नाक लाल पड़ चुकी थी।

उसके चेहरे पर गुस्से और बेचैनी का मिला-जुला रंग साफ़ झलक रहा था।

वह जानती थी, जिहान बहुत ज़िद्दी है।

और जब वह किसी ज़िद में आ जाता है,

तो कुछ भी कर गुजरता है।

यह बात इबादत को बहुत अच्छे से मालूम थी।

उसने तुरंत अपना सिर नफ़ी में हिलाया और टूटी हुई आवाज़ में बोली

“आप ऐसा क्यों कर रहे हैं मेरे साथ?

क्या दुश्मनी है आपकी मुझसे?

क्यों मुझे इस तरह परेशान कर रहे हैं?

आपको इतनी सी बात समझ में क्यों नहीं आती…

मुझे आपके साथ नहीं रहना है।

क्यों मेरे पीछे पड़े हैं?

दो साल… दो साल बहुत बड़ा अरसा होते हैं।

दो साल में तो बहुत कुछ बदल जाता है।

आप समझ क्यों नहीं रहे?”

उसने बहुत ही आहिस्ता से, लगभग रोते हुए, उसे समझाने की कोशिश की थी।

नहीं जीहां, जिसके अंदर न जाने आज कौन-सी आत्मा घुस गई थी, वह उसे देखते हुए उसका हाथ पकड़ता है और उसे सीधा काउच पर बैठा देता है। खुद भी उसके करीब बैठते हुए कहता है,

"वही तो मैं भी कह रहा हूं बेबी एलिफेंट, तुम समझ क्यों नहीं रही? दो साल बहुत बड़ा अरसा होता है। और तुझे क्या पता, इन दो सालों में तुम्हारी क़ुरबत के लिए तड़पा हूं न कि किसी और के करीब गया हूं? तुम्हे नहीं पता ना, इसलिए कह रहा हूं... दो साल हो गए हमारे निकाह को। चलो अब रुकसती करवा कर तुरंत मेरे करीब आ जाओ , इसके बाद मैं ठीक से सास le सकूं। क्योंकि निकाह के बाद मुझे तो बिल्कुल भी सब्र नहीं हो रहा है।"

इबादत, जो "लिटिल एलिफेंट" सुनकर बौखला गई थी, वह सब कुछ भूल चुकी थी। आगे-पीछे का होश खो बैठी। अगले ही पल उसने अपने नुकीले नाखून उसकी गर्दन के पास रख दिए और चिल्लाकर बोली,

"आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझे एलिफेंट कहने की? खुद को देखा है कभी? जिराफ़ जैसे लंबे हो चुके हैं आप! और भले ही पूरी कॉलेज की लड़कियां आप पर मरती हों, पर मैं उन लड़कियों में से नहीं हूं। मैं इबादत हूं, और इबादत जाकिर अख्तर हूं! मुझे आपके वजूद से नफ़रत है। सुनिए, मैंने कहा न... मुझे आपसे नफ़रत है, और इतनी नफ़रत है कि मैं आपके साथ एक लम्हा भी नहीं रह सकती। आपकी मौजूदगी में मुझे सांस नहीं आती!"

वह गुस्से से आंखें दिखाते हुए बोली,

"बेहतर यही होगा कि जितनी जल्दी हो सके, आप पेपर तैयार करवा दीजिए। वरना मेरे पास और भी लोग हैं, जो मेरी मदद कर सकते हैं इस काम में।"

यह कहते हुए उसने उसे वार्निंग भरी नज़र दी और वहां से चली गई।वह जो दरवाजे के अंदर दाख़िल हुई थी, भीगी बिल्ली जैसी लग रही थी।

पर जाते हुए, वह किसी खूंखार शेरनी से कम नहीं लग रही थी।

उसकी इस हरकत पर जिहान के होंठों पर मुस्कान और गहरी हो गई।

वह अपना सर चेयर से टिकाते हुए, दोनों हाथ फैलाकर बोला,

"बीवी तो तुम मेरी ही रहोगी । और रुख़सती में अब ज़्यादा वक़्त नहीं है। जितना चिल्लाना है, और जितनी कोशिश करनी है, कर लो लिटिल एलिफेंट।

पर अगर मैं तुम्हें अपने कमरे में ना लेकर आया, तो मेरा नाम भी जिहान जुबेर अख्तर नहीं!"

यह कहता हुआ वह सीधा क्लोज़ेट की तरफ चला गया।

Jihaan को यह चीज़ किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं हुई। थी

उसे बार-बार अस्पताल का ख्याल आ रहा था, जब वह आयान के करीब गई थी।

वह सोच-सोचकर जल उठता था, कि भला वह इंसान, जिस पर सिर्फ़ और सिर्फ़ जिहान का हक़ था

उसे कोई और कैसे निहार सकता था?

उसे छूने की हिम्मत कैसे कर सकता था?

उसके इतना करीब कोई और कैसे आ सकता था?

इसी सोच ने जिहान का दिमाग़ पूरी तरह घुमा दिया था।

वह किसी भी सूरत-ए-हाल में, इबादत को अपने पास लाना चाहता था।

उसे अपने साथ रखना चाहता था।

फिर चाहे उसे कोई भी रास्ता क्यों न अपनाना पड़े।

क्योंकि जिस दिन उसने पहली बार उन आँखों को देखा था, उसी दिन उसके दिल में नफ़रत से भी गहरी एक आग जल चुकी थी।

और अब वही आग उसके सर पर जुनून बनकर सवार हो चुकी थी।

उससे पहले जिहान को अंदाज़ा नहीं था कि इबादत वही लड़की है, जो उसकी बीवी है।

पर जब से उसे यह पता चला कि इबादत और कॉलेज वाली लड़की वही है, जिस पर वह दिल हार चुका है तो वह भला कैसे इबादत से दूरियाँ बर्दाश्त कर सकता था?

यह जानते हुए भी कि वह लड़की उसके निकाह में है, उसकी बीवी है, वह उसके करीब जा सकता था... बिल्कुल।

और इसमें कोई शक नहीं था कि वह उसे किसी भी चीज़ से इनकार कर सकती थी।

आख़िर उसके पास सारे हक़ थे।

बस उसे रुख़सत का इंतज़ार था।

यही सब सोचते-सोचते, वह थोड़ी देर में तैयार होकर बाहर आया।

उसने उस वक़्त सिंपल ब्लैक कलर का कुर्ता-पजामा पहना हुआ था।

बाल सेट किए हुए थे और हाथों में ब्रांडेड वॉच चमक रही थी।

वह जैसे ही नीचे आया, उसकी नज़र डाइनिंग टेबल के पास बैठे एक जाने-पहचाने चेहरे पर पड़ी।

वह आदमी देखने में तक़रीबन उसकी ही उम्र का लग रहा था।

जिहान उसके पास जाकर, कंधे पर हाथ रखते हुए सख़्त आवाज़ में बोला

"... तुम? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"

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